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  • 04
  • January

संतान प्राप्ति और संतान सुख के लिए करें पुत्रदा एकादशी

संतान प्राप्ति और संतान सुख के लिए करें पुत्रदा एकादशी

पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी और श्रावण की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। यानि इन दोनों एकादशियों पर जातक विधिपूर्वक व्रत कर उसका पालना करता है तो फल की प्राप्ति सुनिश्चित मानी गई है। इसके लिए पुराणों में बताए अनुसार उसके यम-नियमों की पालना के साथ किया जाना जरूरी माना गया है। इसके लिए दशमी तिथि को शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी का व्रत रखने वाले को अपने मन को शांत एवं स्थिर रखना चाहिए. किसी भी प्रकार की द्वेष भावना या क्रोध मन में न लायें. परनिंदा से बचें। प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना चाहिए तथा स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीप प्रज्वलित करना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी, ऋतु फल एवं तिल का प्रयोग करें। व्रत के दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए, शाम में पूजा के बाद चाहें तो फल ग्रहण कर सकते है। यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है इसलिए रात में जागकर भगवान का भजन कीर्तन करें। एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

जिन दंपतियों को संतान की प्राप्ति नहीं होती हैं. उन्हें संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत अवश्य करना चाहिए। श्रावण पुत्रदा एकादशी का श्रवण एवं पठन करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है, वंश में वृद्धि होती है। सम्पूर्ण विधि से पूजा-अर्चना करने के पश्चात एकादशी माता की आरती का पाठन अवश्य करना चाहिए।

पुत्रदा एकादशी की आरती

ऊँ जय एकादशी माता, जय एकादशी माता। विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी। गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी। शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है। शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै। शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
पापमोचनी फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला पापमोचनी। पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
चैत्र शुक्ल में नाम पापमोचनी, धन देने वाली। नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी। नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी। देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए। श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला। इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी। रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया। पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी। शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
।।ऊँ जय एकादशी॥
जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै। जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥
।।ऊँ जय एकादशी॥

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