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  • 11
  • February

शिव की महिमा : रुद्राष्टकम्

शिव की महिमा : रुद्राष्टकम्

शिव की महिमा अपरम्पार है। शिव की पूजा-आराधना करने से शिव अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले देव भी हैं। शिव की कई स्तुतियां हैं जिनमें रुद्राष्टकम स्रोत का पाठ नियमित करने से भक्त के सभी कार्य सफल होते हैं और आने वाली कठिनाइयों का समाधान भी होता है। इसे नित्य नियमपूर्वक करने से मनुष्य के जीवन में शांति और सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। रुद्राष्टकम स्रोत अर्थ सहित दिया जा रहा है।

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्।

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान ऊँ के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकार आकाश के सामान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता उनकी मैं उपासना करता हूँ।

निराकारमोङ्करमूल तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोहम्।

जिनका कोई आकार नहीं, जो ऊँ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पूरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गंभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा।

जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर हैं, जो गौर रंग के हैं जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार हैं, जिनकी देह सुंदर हैं, जिनके मस्तक पर तेज हैं जिनकी जटाओ में लहलहारती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं, और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि।

जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं जिनके चेहरे पर सुख का भाव हैं जिनके कंठ में विष का वास हैं जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड की माला हैं ऐसे प्रिय शंकर पूरे संसार के नाथ हैं उनको मैं पूजता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्र्य:शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्।

जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड है जो अजन्मे हैं जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं जिनके पास त्रिशूल हैं जिनका कोई मूल नहीं हैं जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति हैं ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं उन्हें मैं वन्दन करता हूँ।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।

जो काल से बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते हैं और धर्म का साथ देते हैं, जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं जो मुझसे खुश रहे ऐसे भगवान जो कामदेव नाशी हैं उन्हें मेरा प्रणाम।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।

जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में कमल वन्दन करता हैं ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख हैं, शांति हैं, जो सारे दुखों का नाश करते हैं जो सभी जगह वास करते हैं।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जराजन्मदु:खौध तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।

मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, ना ध्यान। ऐसे देव के सामने मेरा मस्तक झुकता हैं, सभी संसारिक कष्टों, दु:ख दर्द से मेरी रक्षा करे. मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें। मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ।

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