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  • 06
  • January

वसंत पंचमी से बसंत ऋतु का आगमन

वसंत पंचमी से बसंत ऋतु का आगमन
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। और इसी परिवर्तन को जिस उत्साह के साथ जीवन में परिवर्तन का मनुष्य ने स्वागत किया वही त्योहारों के रूप में परंपरा में शामिल होता गया। बसंत पंचमी ऋतुओं के उसी सुखद परिवर्तन का स्वागत समारोह है। ऋतु का परिवर्तन होना इस दिन उल्लास का नवसंचार भी प्रकट करता है। धार्मिक रूप से यह त्योहार विद्या की देवी सरस्वती की पूजा से संबंधित है। संपूर्ण भारत में बड़े उल्लास के साथ बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। बसंत पंचमी के पर्व से ही बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है, साथ ही इस पर्व को ऋतुराज पर्व भी नाम दिया गया है।
बसंत पंचमी का अर्थ है शुक्ल पक्ष का पांचवां दिन। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी-फरवरी तथा हिन्दू तिथि के अनुसार माघ के महीने में मनाया जाता है। बसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। इस समय पंचतत्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। पंचतत्व माने जाने वाले जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। दरअसल मौसम और प्रकृति में मनोहारी बदलाव होते हैं जिसने मनुष्य को सदा से उल्लासित किया है। पेड़ों पर फूल आ जाते हैं। नई कोपलें निकल आती हैं। पेड़ों में बौर आने का संकेत मिल जाता है।
इन श्रृंगारिक परिवर्तनों ने कवियों को सदैव आकर्षित किया है और बसंत हमेशा से कविता का विषय रहा है। प्राय: हर भाषा के कवि ने बसंत का अपनी तरह से वर्णन किया है। बसंत पर्व का आरंभ बसंत पंचमी से होता है। इसी दिन श्री अर्थात विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन भी मनाया जाता है।
ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्विनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघ मास की पंचमी तिथि निर्धारित की गई है। बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। अत: वागीश्वरी जयंती व श्रीपंचमी नाम से भी यह तिथि प्रसिद्ध है। बसंत पंचमी को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। मुख्यत: विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए बसंत पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे कई कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। दूसरे इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं, जो कि शुभता के सूचक होते हैं।

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