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  • 02
  • November

एक शब्द है- ध्यान….

एक शब्द है- ध्यान। मेडिटेशन। प्रत्येक व्यक्ति ने अपने जीवन स्तर में कहीं न कहीं सुना है कि दिन की शुरुआत या फिर जब हम रात्रिकाल में विश्राम की ओर अग्रसर हो रहे हों तो मेडिटेशन करना चाहिए। ध्यान लगाना चाहिए। एकाग्रता बढ़ती है। मन के भीतर विचारों का प्रवाहों तो लगातार रहता है। किन्तु उसमें जो गति है उसमें एक स्थिरता आने लगती है और हम जब भी ध्यान की ओर जाते हैं तो ये महसूस होता है कि भटकाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। या फिर कई बार व्यक्ति को यह लगता है कि मैं अगर ध्यान करने बैठता हूं तो और ज्यादा विचलित हो उठता हूं। किन्तु वो एक शुरुआती स्तर की स्थिति है। अगर आप इसको लम्बे समय तक जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं तो वास्तविक स्तर के ऊपर एक स्थिरता आने लगती है। चित्त में चेतनता का वास होने लगता है।
इसको एक उदाहरण के साथ में समझा जाए तो आप देखिये कि एक व्यक्ति खेल में बहुत ज्यादा महारथ हासिल कर चुका है। उसने अपनी जो स्किल है उस पर बहुत ज्यादा फोकस एप्रोच में चलने का प्रयास किया। एक महानुभाव गायन के साथ में जुड़े रहे उन्होंने अभ्यास के समय बाकी सारी ही स्थितियों से तारत्म्य और नाता दूर किया। सिर्फ और सिर्फ रियाज के साथ में स्वर सुधा के साथ में जुड़ते चले गए तो वहां एक नई पोजीशन उन्होंने महसूस की। एक व्यक्ति ने लम्बे समय तक नौकरी में अनुभव लिया और यह कहा गया कि इनका फोकस जॉब की पोजीशन्स के साथ में बहुत अच्छा है। यह डिपर सेंश में कुछ और नई वस्तुस्थितियां निकालकर लेकर आते हैं, क्योंकि जब उन्होंने अपने नौकरी की शुरुआत की, उसी समय से उनका ध्यान अपने कामकाज में बहुत अधिक था। ये ध्यान की वास्तविक परिभाषा को जैसी ही है कि बच्चों को कहा जाता है कि ध्यान से पढ़ाई करो। ध्यान से सुनो। यही एक एप्रोच है जिसके साथ में व्यक्ति एक अपने मन के अंदर जो लगातार मिनिमाइज और मैक्सीमाइज होती हुई स्कील्स है, उसको थोड़ा-सा हटाने का प्रयास कर सकता है। और खुद के फ्लो को एक सिमेटरी में लेकर आ सकता है। ये जो समय अंतराल हमें मिला है, अगर हम शुरुआत करना चाहते हैं ध्यान की और अपने मन को एक केन्द्र के साथ में जोडऩा चाहते हैं, चित्त के साथ में जोडऩा चाहते हैं तो हम इस नए दिन की शुरुआत के साथ नए महीने की शुरुआत के साथ में अपनाने का कार्य कर सकते हैं।

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